बचपन एक बार फिर...

 

बचपन एक बार फिर...

 

कितना सुंदर और अनकही है यह दुनिया

कितनी मस्त है यह प्यारी सी दुनिया

वह प्यारा सा मचलना और रूठना

बात बात पर खिलखिला कर हँसना

बेबाक़ हो सब कुछ कह जाना

लोट पोट हो सबको रिझाना

 

 माँ की डाँट डपट से डरना

फिर भी मनमानी करते रहना

भाई बहन सब से लड़ना

नहीं मानना किसी का कहना

फिर भी  दुनिया सबकी गुलज़ार करना

घर में रौनक़ रखना, चिलपिल करते रहना

सबको हँसते हँसाते रहना

दिल सभी का  जीत लेना

 

तुम्हारी हर मासूम शरारत कहती है

हम को भी मस्ती अच्छी लगती है

तुम संग हम भी बच्चे बन जाते हैं

सारे दर्द कुछ पल भूल जाते हैं

 

तुम्हारे खेल कूद और किस्से कहानी

 सबको मज़ेदार लगते हैं , और हम

जाने अनजाने  नए पाठ पढ़ जाते हैं

 

तुम्हारे सतरंगी सपने भाते हैं

जब पर लगा, वो आसमाँ छू जाते हैं

वीर बहादुर देख देख हम इठलाते हैं

सपने साकार कराने जुट जाते हैं

तुम्हें ऊँचा चढ़ता देख बस ख़ुश हो जाते हैं

अपनी मेहनत सफल हो देख हम भी थोड़ा इतराते हैं  

बच्चों तुम्हारी इस दुनिया में थोड़ा मज़ा हम भी कर जाते है

 एक नया बचपन जी जाते हैं……

अवश्य, एक नया बचपन जी जाते हैं

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